गुरु पूर्णिमा कल मनाई जाएगी जानिये उसका महत्व

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गुरु पूर्णिमा कल मनाई जाएगी जानिये उसका महत्व

RH Team दी. ४ जुलाई २०२०

गुरु पूर्णिमा पर्व हिन्दू धर्म का एक विशेष महत्वपूर्ण त्योहार है.  यह पर्व हर साल आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाया जाता है. इस साल यह तिथि पांच जुलाई को पड़ रही है.  गुरु पूर्णिमा को गुरु उत्सव या गुरु पूजन के नामसे भी जाना जाता है.  गुरु पूर्णिमा का उत्सव गुरु के प्रति श्रद्धा, आदर और कृतज्ञता को दर्शाता है.  इस वर्ष कोरोना काल में इस उत्सव का रंग थोड़ा फीका रहेगा. मगर पुरे हिन्दुस्थानमें यह उत्सव मनाया जाएगा. तो चले पहले जानते हैं गुरु पूर्णिमा का महत्व.

हिंदू संस्कृतिमें गुरु और ईश्वर दोनों को एक समान माना गया है.  गुरु भगवान के समान है और भगवान ही गुरु हैं.  गुरु ही ईश्वर को प्राप्त करने और इस संसार रूपी भव सागर से निकलने का रास्ता बताते हैं.  गुरु के बताए मार्ग पर चलकर व्यक्ति शान्ति, आनंद और मोक्ष को प्राप्त करता है. भारतीय संस्कृति में गुरु का काफी महिमामंडन किया गया है.  गुरु की कृपा से ज्ञान प्राप्त होता है और उनके आशीर्वाद से सभी सुख-सुविधाओॆ, बुद्धिबल और एश्वर्य की प्राप्ति होती है.  इसलिए भारतीय संस्कृतिमे गुरुको पूज्यनीय माना गया है. ऐसे पूज्यनीय वर्ग का हरसाल सम्मान हो इसलिए गुरु के सम्मान में गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है. इस दिन हिन्दुजन  अपने गुरु के सम्मान में कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे और उनको श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे.  इस दिन बड़ी संख्या में लोग गुरु से दीक्षा भी ग्रहण करते हैं.

 

गुरु पूर्णिमा महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है.  वेदव्यास संस्कृत के महान ज्ञाता थे. हिन्दू मान्यताओंके अनुसार  सभी १८  पुराणों का रचयिता भी महर्षि वेदव्यास को माना जाता है.  इस दिन महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था.  वेदों को विभाजित करने का श्रेय भी वेद व्यास को दिया जाता है.  इसी कारण इनका नाम वेदव्यास पड़ा था. हिंदुओंके मान्यताओंके अनुसार महर्षि वेद व्यास हिंदुओंके प्रथम द्न्यात गुरु है इसीलिए उन्हें आदि गुरु भी कहा जाता है.

आजकल सामान्यतः हम लोग शिक्षा प्रदान करने वाले को ही गुरु समझते हैं परन्तु वास्तव में ज्ञान देने वाला शिक्षक मर्यादित अर्थों में गुरु होता है. हिन्दू मान्यताओंके अनुसार पुरे जीवन का द्न्यान देनेवालेको गुरु कहा जाता है. प्राचीन काल में गुरु ही शिष्य को सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह का ज्ञान देते थे लेकिन आज वक्त बदल गया है.  आजकल विद्यार्थियों को व्यावहारिक शिक्षा देने वाले शिक्षक को और लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान देने वाले को गुरु कहा जाता है.  यह जरूरी नहीं है कि हम किसी व्यक्ति को ही अपना गुरु बनाएं.  योग दर्शन नामक पुस्तक में भगवान श्रीकृष्ण को जगतगुरु कहा गया है क्योंकि महाभारत के युद्ध के दौरान उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश दिया था.

अंतत: हम आजके जमाने में यह जरुर कह सकते है की गुरु वही है जो हमें जीवनमें सही मौकेपर  सही द्न्यान देता है. आजके जमाने में हम जिसिसे जो भी अच्छाइ या गुण लेते है वह हमारा गुरु है. एक मराठी संत ने बहुत खूब कहा है –

“ जो जो जयाचा घेतलासे गुण.  त्यासी केले म्या गुरु जाण. गुरुसी पडले अपारपण. सारे जग गुरु दिसे.”

तो आजके बहुत व्यस्त जीवनशैलीमे हर समय मिले हुए हर व्यक्तिसे उसकी अच्छाईया लेकर उसको अपना गुरु समझना चाहिए. ऐसी सकारात्मकताही  हमें जीवन में यशस्वी कर सकती है.  और ऐसे समस्त व्यक्तिओंको एक गुरुके रूप में देखकर  और उनके प्रती कल गुरु पुर्निमाके दीन अपना आदर आदिगुरू महर्षि व्यासके प्रतिमाका श्रद्धापूर्वक पूजन करके व्यक्त करना चाहिए.

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